छत्तीसगढ़ के गीतकार.आत्मपरक गीत
आभा श्रीवास्तव
अतिथि सहायक प्राध्यापक ;हिन्दीद्ध शाण्भानुप्रताप देव उपाधि महा विद्यालय
कांकेर छत्तीसगढ़
*Corresponding Author E-mail: dr.abha.knk@gmail.com
ABSTRACT
गीतकार के गीतों में सर्वप्रथम प्रत्यक्ष प्रभाव उसके अपने जीवन का होता है, तत्पश्चात् व्यक्ति विशेष से सम्पर्क व संबंधों का प्रभाव परिलक्षित होता है। गीत की इसी आत्मपरकता व व्यक्तिपरकता को हम इस तरह आत्मसात् कर अभिव्यक्त कर सकते हैं कि साहित्य मूलतः सर्जन है - निर्माण नहीं।
KEYWORDS पक्षियों का चहचहाना, नदी की कल-कल ध्वनि, पेड़ों का उगना, पेड़ों का गिरना, सुबह का आना
गीतकार के गीतों में सर्वप्रथम प्रत्यक्ष प्रभाव उसके अपने जीवन का होता है, तत्पश्चात् व्यक्ति विशेष से सम्पर्क व संबंधों का प्रभाव परिलक्षित होता है। गीत की इसी आत्मपरकता व व्यक्तिपरकता को हम इस तरह आत्मसात् कर अभिव्यक्त कर सकते हैं कि साहित्य मूलतः सर्जन है - निर्माण नहीं। निर्माण में एक वैज्ञानिक एकरूपता है, सर्जन में वैयक्तिक चेतना सम्पन्न विशिष्टता । निर्माण में तथ्यपरक समानता होती है, जबकि सर्जन में भावपरक विविधता। मानव ईश्वर का निर्माण नहीं, सृष्टि ईश्वर का निर्माण है। परिणामतः कोई मनुष्य एक दूसरे से पूर्णतः समान नहीं है ।
चूंकि काव्य भी दूसरी प्रजापति की सृष्टि है अतएव उसमें उसके अपने व्यक्तित्व की प्रतिच्छाया स्पष्टतः रहती है, जिसे हम ‘आत्मपरक गीत’ कहते है, जिसमें प्रत्येक गीतकार की व्यक्ति सापेक्ष चेतना उनको धरातल पर एक दूसरे के समीप लाकर भी तथा सार्वभौम एवं शाश्वत् भावों के सूत्र में जोड़कर भी प्रत्येक के काव्य को एक निजी वैशिष्ट्यता से सम्पन्न कराती है । यही कारण है कि समान भावों एवं समान विषयों को लेकर की गयी साहित्य रचना में भी समानता संभव नहीं है, जो विज्ञान आदि की समान विषयों की पुस्तकों में रहती है क्योंकि साहित्यकार आत्मानुभूत सत्यों एवं संवेदनों को आत्मसात् कर उन्हें सामूहिक आस्वाद के योग्य बनाकर अभिव्यक्त करता है।
पक्षियों का चहचहाना, नदी की कल-कल ध्वनि, पेड़ों का उगना, पेड़ों का गिरना, सुबह का आना, शाम का आना आदि असंख्य घटनायें आरोह-अवरोह के धु्रवों पर टिकी हुई हैं। अतः गीतकार के लिये परिभाषाओं विधाओं का जानकार होना ही पर्याप्त नहीं, यह तो एक प्रकार का भ्रामक सत्य होगा। सत्य होने के लिये उसे अपना रास्ता स्वयं बनाना पड़ता है, बनाना भी क्या किसी हद तक अपने आप बनता चलता है।
चूंकि गीत मनुष्य की आत्मा का दर्द है अतः इसके स्वरूप के लिये जीवन से जन्म से अर्थात् मैं से लेकर सृष्टि में क्या हो रहा है ? तक जानने की प्रक्रिया गीत के विभिन्न स्वरूपों को स्पष्ट करती है। आज कविता के क्षेत्र में जहां कहीं गीत का नाम आता है, जेहन में एक हल्केपन का बिम्ब बनता है और किसी तराने की सी गूंज भीतर महसूस होने लगती है जिसमें ‘मैं’, ‘व्यक्ति विशेष’, ‘लोगों के प्रति संवेदना’, ‘राष्ट्रीय चेतना’ सभी कुछ सुरक्षित रहते हैं।
सुख मानव जीवन में क्षणिक है जबकि दुख की सीमा नहीं ! दुख भी कई प्रकार केहोते हंै, जिसे हम परेशानी, कष्ट, शोक के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं। लोगों की दुखद स्थिति के प्रति सहानुभूति ही लोक संवेदना कहलाती है। गीतकारों ने अपने गीतों के माध्यम से लोक संवेदना युक्त गीत को अभिव्यक्त किया है। इन्होंने अपने गीतों में युग यथार्थ को, हो रहे शहरीकरण, औद्योगिकरण और मशीनीकरण की प्रक्रिया के चलते स्थानीय मूल्यों के क्षरण को व्यक्त किया है। सबसे ज्यादा वह व्यवस्था जो इन स्थितियों के लिये जिम्मेदार है, उसे भी पहचानने का काम इन गीतकारों ने किया है ।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जीवन के पुनरूत्थान एवं राष्ट्रों के नव-निर्माण के लिये जितनी क्रांतियां हुई है, उनमें सर्वाधिक योगदान युवाओं का रहा है । उन्हें अपनी ताकत को विकसित करने का एवं उनमें राष्ट्रीय भावना का उद्रेक कर उनका मार्ग इस तरह प्रशस्त करना कि वह अपने महत्व को पहचान सके और राष्ट्र के नव निर्माण में अपनी पूरी शक्ति लगा सके इसमें आधुनिक काल के गीतकार पूर्ण सफल रहे हैं ।
छत्तीसगढ़ के गीतकारों ने राष्ट्रप्रेम को पारंपरिक गीतों के राष्ट्रप्रेम से कुछ अलग हटकर व्याख्यायित किया है । देश के भौगोलिक परिवेश का गुणगान या मानचित्र पर अंकित भारत के रूपाकार की यशवंदना की स्थूलता को गीत का विषय बनाने के मोह को त्याग कर उसकी माटी, उसमें रचे-बसे लोगों के आचार नियमों, परंपरा, इतिहास, धर्म और तदनुकूल इन सभी तत्वों से संगुफित संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन की ललक ही इन गीतकारों का राष्ट्रप्रेम या उसका राष्ट्रीय संदर्भ है।
आत्मपरक गीत -
आत्म अर्थात् स्वयं गीतकार आत्मानुभूत सत्यों एवं संवेदनों को आत्मसात् कर उन्हें सामूहिक आस्वादन के योग्य बनाकर अभिव्यक्त करता है। गीतकार के आत्मानुभूति के स्वरूप का अध्ययन गीतकार की मानसिकता और उसके सामाजिक-साहित्यिक परिवेश के आधार पर ही किया जा सकता है। युगीन संदर्भो का प्रत्यक्ष प्रभाव गीतकार की नितान्त वैयक्तिक सीमाबद्धता को त्याग कर आत्माभिव्यक्ति को एक सामान्य धरातल प्रदान करता है। यहां आत्माभिव्यक्ति से तात्पर्य केवल उस सीमित व्यैक्तिकता से नहीं है, जिनके आधार पर पाश्चात्य समीक्षक ‘शैली’ की व्याख्या करते हैं। साहित्यकार की जीवन दृष्टि, घटनापरक अनुभूति तथा सूक्ष्म चिन्तन दूसरे शब्दों में उसका पूरा व्यक्तित्व ही साहित्य में किया गया साहित्य का वर्गीकरण सुविधाश्रित एवं स्थूल ही अधिक है अन्यथा साहित्य में विषयी कभी लुप्त नहीं होता। गीतकाव्य को आत्मानुभूति के दबाव का विस्फोट ही माना गया है। एक लम्बे समय तक स्वानुभूति की निवृत्ति को गीत का अपरिहार्य तत्व माना जाता रहा है। इसमें आंतरिक वृत्तियों की आवेगयुक्त अभिव्यक्ति रहती है।
भारतेन्दु युग के गीतकारों ने काव्यशिल्प की तुलना में काव्य वव्र्य पर अधिक ध्यान दिया है। भारतेन्दु युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इसके पूर्व रीतिकाल में जिस वैयक्तिक श्रृंगारमयी काव्यधारा पर बल रहा था, उसके स्थान पर गीतकार समाज और राष्ट्र को उद्बोधन देने वाली लोकमंगलकारी दृष्टि की ओर उन्मुख होने लगे थे। जबकि छायावादी गीतकारों की दृष्टि रोमानी है। वस्तुजगत् के प्रति इनकी प्रतिक्रिया अत्यंत भावात्मक है। ये वस्तुजगत् से नहीं वस्तु जगत् की प्रक्रिया से उत्पन्न अपने निजी सुख-दुख के आवेग से सम्बद्ध थे। इनके गीतों में आत्म संपृक्ति और उत्तेजना मिलती है। विषय मूलतः सौन्दर्य और प्रेम तथा उल्लास और विषाद की अनुभूति है। इनकी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम गीत है। इन गीतकारों में साहस के साथ सीधे-साफ तौर पर अपने निजी पे्रम संवेग तथा सुख-दुख को कहने की आकुलता है। व्यक्तिवादी गीत का ‘मैं’ अपने समूचे राग विराग के साथ निब्र्याज भाव से फूट चलता है ।
यदि हम इस धारा में आने वाली कृतियों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें तो ज्ञात होगा कि लौकिक प्रेम इनकी केन्द्रीय वृत्ति है । इनका हर्ष-विषाद न तो आदर्श का छल ओढ़ता है और न धरती-आकाश के बीच झुकता है । वह विशुद्ध धरती पर यात्रा करता है ।
हरिवंशराय बच्चन जी के ‘निशा निमन्त्रण’ और ‘एकान्त संगीत’ गीत यदि प्रेम के अवसाद के घनत्व को मुखर करते हैं तो ‘मिलन यामिनी’ मिलन की मादकता और उमंग को। वास्तव में इस धारा की कृतियों का मूल स्वर प्रेम है और प्रेमजन्य व्यथा तथा उदासी यहां से वहां तक व्याप्त है ।
गीतकार अनुभव करता था कि संसार को उसके ये गान वासना के गान लग रहे है, इसलिये उसे स्वीकार्य नहीं है, किन्तु कवि इन्हें अपने अनुभव का गान मानता था । इन अनुभव सत्यों को उसका स्वच्छन्द हृदय अनियंत्रित भाव से गाना चाहता था । बच्चन जी ने अपने और समाज के इस तनाव को स्पष्ट अनुभव करते हुए कहा है -
कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा ।
अर्थात् प्रेम के संदर्भ में सामान्य तौर पर मान्य सामाजिक दृष्टिकोण, गीतकार के प्रेमी मन को लांछित करती है ।
वृद्ध जग को क्यों अखरती है, क्षणिक जवानी मेरी ?
के द्वारा गीतकार पिछड़ी मानसिकता युक्त समाज को दोषी करार देते है और अपने वैयक्तिक उद्गार व्यक्त करते हैं ।
शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा
छायावाद की आत्मपरक कृतियों में निराशा और उदासी का जो स्वर मुखरित हुआ है, वह केवल प्रेममूलक नहीं है। जीवन के अन्य संदर्भों जैसे सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक रिक्तता का भयंकरअहसास, अकेला, स्वच्छन्द, संवेदनशील युवा मानस का बार-बार टूटता जैसे विषयों से आत्मपरकता आयी है।
कितना अकेला आज मैं, संघर्ष में टूटा हुआ,
दुर्भाग्य से लुटा हुआ, परिवार से छूटा हुआ 3
छायावादी नरेन्द्र शर्मा के गीतों का अपना वैशिष्ट्य है । इनके गीतों का सुख-दुख सीधे प्रेमपात्र को निवेदित है । बीच में न कोई अवधरणा आती है न कोई छल । प्रकृति सौन्दर्य मानव सौन्दर्य और उससे उत्पन्न विरह-मिलन की आत्मानुभूतियाॅं अभिव्यक्त हुई हैं -
फिर फिर रात और दिन आते
फिर फिर होता साॅंझ सवेरा
मैंने भी चाहा फिर आये
बिछुड़ा जीवन साथी मेरा 4
रामेश्वर शुक्ल अंचल जी के काव्य प्रकृति का निर्माण रूप की उद्दाम आसक्ति, उद्दाम वासना, उद्दाम पीड़ा और उद्दामता जिजीविषा ने किया है । वासना की उद्दासना गीत को एक ओर सामाजिक संयम से काट देती है जो दूसरी ओर रचनात्मक स्तर पर उसे अनुभूति की गहराई और संश्लिष्टता की अपेक्षा उत्तेजना अधिक देती है ।
भगवतीचरण वर्मा जी के गीतों में कई प्रकार की आत्मिक अनुभूतियों का संगम मिलता है । इनमें परंपरा के साथ युगबोध, वैयक्तिक सुख-दुख, हर्ष-विषाद और सामाजिक विद्रोह तथा अभिजात भाषा के साथ ऊर्जामयी सामान्य भाषा का अस्तित्व लक्षित होता है । फिर भी मस्ती, आवेश और अहं इनके गीतों के केन्द्र में है ।
महादेवी वर्मा - लोक परिवेश और लोकभाषा से दूर, सीमित आत्मानुभूति की परिधि में विचरण करने वाले, भाषा की अभिजात छवि से मंडित इनके गीत अत्यंत विशिष्ट हैं ।
छायावादोत्तर आत्मपरक गीतकारों में गोपालसिंह नेपाली, आरती प्रसाद सिंह, शम्भुनाथ सिंह प्रमुख है । इनके गीतों में चित्रित प्रेम-संवेग का भी अपना वैशिष्ट्य है । उनमें बड़ी सादगी, प्रवाह व माधुर्य है ।
छत्तीसगढ़ के गीतकारों ने आत्मपरक गीतकाव्य के बदलते हुये स्वरूप का विश्लेषण किया, जिसके दौरान मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या सभी गीतकारों की अनुभूतियाॅं गीतकाव्य में अभिव्यक्ति पाती है? क्या गीतकाव्य में अनुभूतियों का घटनापरक स्थूल स्वरूप स्पष्ट रहता है ? और क्या इसके आधार पर गीतकार के जीवन की स्थूल व्याख्या की जा सकती है ।
जिन अनुभूतियों का स्थायी मूल्य नहीं और जिनका तादात्मक पाठक से न हो सके, उनको काव्य में अभिव्यक्ति देना सार्थक नहीं यह तथ्य गीतकाव्य पर लागू होता है । जिन अनुभूतियों को शुद्ध रागात्मक धरातल न प्रदान किया जा सके, वे गीतकाव्य की परिधि से बाहर हैं । गीतकाव्य की प्रभविष्णुता के लिये इसमें अनुभूति की आवेगमयी तीव्रता अपेक्षित है । प्रश्न यह उठता है कि क्या तीव्र आवेग के क्षणों में गीतकार किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति की स्थिति में होता है ? स्पष्टतः साहित्य सर्जन जैसा कला व्यापार उस स्थिति में संभव नहीं ।
उपर्युक्त समस्या का उत्तर ‘भले ही तीव्र भाव संकुल स्थितियों में अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यक्ति संगत नहीं है, पर ये क्षण भावी रचना के लिये मूल प्रेरणा बिन्दु अवश्य बन जाते हैं । यही प्रेरणा बिन्दु क्रमशः लय, बिम्ब एवं भाषिक चेतना के नये क्षितिजों के अन्वेषण में गीतकार को प्रवृत्त कर देते हैं । यह प्रेरणा ही अंततः भाव प्रवणता से तीव्रता पाकर और कल्पना से सहज सौन्दर्य-सम्पन्न कलेवर पाकर तथा छांदसिक अनुशासन में ढलकर गीतकाव्य का स्वरूप ग्रहण करती है ।
तात्पर्य गीतकाव्य में केवल उन्हीं अनुभूतियों का महत्व है, जो गीतकार और पाठक के हृदय में एक आंतरिक भावधारा प्रवाहित कर सके और जो भाव सम्प्रेषणीयता खोये बिना मूल आवेग की शक्ति के साथ प्रस्तुत की जा सके ।
छत्तीसगढ़ के साहित्य मनीषी श्री लाला जगदलपुरी का रचना के जन्म के संबंध में विचार एवं उनकी आत्मपरकता छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन् सम्पूर्ण साहित्य जगत् की अनमोल धरोहर है - ‘अकस्मात् किसी माध्यम से एक कोई सोच उभरकर मन को जब बाॅंध लेती है, तो वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये व्याकुल हो उठती है । तब कहीं रचना धर्मिता प्रसव-पीड़ा भोगकर एक किसी रचना को जन्म दे पाती है ।
अपनी आत्माभिव्यक्ति को गीतों में पिरोकर उसे गाना, सही मायने में उस धरती का कर्ज चुकाने का उपक्रम है ।
छत्तीसगढ़ की धरती का कर्ज चुकाने का यही उपक्रम लालाजी का गीतकार कर रहा है । लालाजी का गीत-कवि हमारी अग्रज पीढ़ी की एक स्मरण यात्रा जैसा है । लालाजी के गीत परंपरावादी गीत है, इसलिये सब तरह के विवादों से परे है ।
आपके गीतों में व्यक्ति की पीड़ायें हैं और व्यक्तिगत पीड़ा भी । लालाजी ने आत्मा की चित्रकारी की है, कहीं भी कृत्रिमता का नाम नहीं । लालाजी का एक आत्म वक्तव्य -
सुन मेरी सूखती नदी
शुष्कता रही तेरी सम्पदा अकूत
जिन्दगी, युगीन शुष्कता से अभिभूत
शुष्कता प्रभावित प्रकृति के आयाम
शुष्कता विजय का दे रही सबूत
पाॅंव पखारने को आयी फिर नई सदी
उपर्युक्त पंक्तियों में आत्मवक्तव्य के साथ-साथ युगीन वक्तव्य भी है । लालाजी के कविता पुरूष में कहीं भी कथ्य और उनके व्यक्तित्व में विसंगति नहीं है । जीवन का भोगा हुआ यथार्थ उनके गीतों का मूल चरित्र है, जो आज के गीतों में महज प्रदर्शन या लेखनी का कृत्रिम चरित्र बनकर रह गया है । लालाजी का रचनाकार युग के साथ चलता है । कहीं भी उसकीपदचाप सुनाई नहीं देती परन्तु गीत का स्वर आप हर जगह सुन सकते हैं । इस तरह के प्राणवान और सत्य की शिला पर खड़े गीतों की रचना अंतर्मन को छू जाती है ।
साहित्य एवं व्यवहार जगत् की जिस प्रशान्त शाद्वल भूमि पर एक महान् गीतकार और उनके गीत जो अमर हो गये, ऐसे श्री नारायणलाल परमार जी आत्मपरकता के संदर्भ में स्वयं जो विचार व्यक्त करते हैं वह ये कि वे स्वयं को एक अति सामान्य नागरिक मानते हैं । परमार जी कहते है कि वे अत्यंत सामान्य नागरिक की तरह पैदा हुये हैं और ऐसे ही चुपचाप मरना भी है । जिन्दगी में रेखांकित करने लायक कुछ भी नहीं मानते । अपने जीवन में किये गये संघर्ष के संबंध में उनकी सोच इतनी सरल है कि, परमार जी का कथन जीवन में संघर्ष कौन नहीं करता, मैंनें भी जीवन में तकलीफें झेली है, इसमें अनूठा क्या है ? कल भी इनसे मुक्ति नहीं मिलने वाली क्योंकि यह अटल सत्य है कि सेवा निवृत्ति के बाद मुझे फिर उसी चैराहे पर आना है, लेकिन विश्वास करता हॅंू कि मैं कहीं टूटूॅंगा नहीं । संघर्ष चाहे जैसा भी हो मैं उसे झेलकर पार निकल जाऊॅंगा ।
ऐसे घोर आशावादी गीतकार के गीत कितने सशक्त होंगे, यह तो केवल महसूस ही किया जा सकता है । आत्मान्वेषण के लिये एक प्रकार के अकेलेपन की जरूरत होती है, जिसे पाकर उन्होंने स्वयं विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामीत्व पाया -
जब कभी आर-पार होता हॅंू, मैं बहुत धारदार होता हॅंू
ग्रीष्म का हॅंू गुलाब, हॅंस-हॅंसकर साथियों पुरबहार होता हॅंू
लोग कहते हैं गुलमुहर देखो, और मैं र्निविकार होता हॅंू
लाॅंघ कोई सका नहीं अब तक, जाने क्यों मैं अपार होता हॅंू
शब्द के साथ मौन रहकर भी, मैं कितना शानदार होता हॅंू । 2
जिस तरह कोई गायक अच्छे सुर और बोल निकालने के लिये बार-बार आलाप लेता है, उसी तरह परमार जी अपनी बातों को मनवाने के लिये तर्को और तथ्यों को बार-बार दुहराते हैं । उन्होंने कभी विश्राम नहीं लिया, निरन्तर रचनाशील रहे । उनकी स्पष्टता और जनवादी मानवीय मूल्यों की पक्षधरता ने उन्हें अनेक मित्रों और स्वजनों से अलग रखा । परमार जी को अपने विचार मूल्यों से डिगना कतई पसंद नहीं -सांसों से यदि धुंआ उठ रहा, मत समझो यह चमत्कार है ।
अक्सर सूरज को धोखे में, रखता आया अंधकार है ।
श्री हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ अंचल के सदाबहार गीतकार है । इनके गीत किसी भी मौसम में मूड आने पर खिल उठते हैं। उन्होंने काव्य की सभी विधाओं पर लेखनी चलायी। श्री हरि ठाकुर के काव्य का अंतरंग अत्यंत बेचैन है । जीवन के यथार्थ का उन्हें तीखा अनुभव है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विद्रोह है ।
गीतकार के अतीत में भी इस तरह की साहसिकता का अभाव नहीं रहा, वर्तमान में भी उसका अभाव नहीं है । गीतकार कर्म से भी विद्रोही रहे हैं । स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले यह गीतकार यदि चाहते तो ‘बिना पेंदी का लोटा’ बनकर बड़े आराम से सुख और ऐश्वर्य का जीवन जी सकते थे, लेकिन जीवन की अनुभूति जब तक शब्दों में परिवर्तित न की जाये, तब तक रचनाकार को चैन नहीं ?
‘लोहे का नगर’ श्री हरि ठाकुर जी का एक ऐसा ही गीत संग्रह है, जिसमें गीतकार ने जो भावचित्र निर्मित किये हैं, वे साहित्य की अमूल्य निधि हैं । आज के इस तथाकथित सभ्य मानव के शहरी, यांत्रिक जीवन की सारी विभिषिकाओं विसंगतियों को यथार्थ की भूमि पर देखने की चेष्टा की गई है ।
गीतकार ने अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष को व्यंग्यात्मक एवं तेजस्वी प्रतीक के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यह कितना तेजाबी है यह इसे पढ़ने के बाद ही हमने जाना।
आत्मपरक गीत के संदर्भ में श्री विद्याभूषण मिश्र जी कहते है ‘गीत दरअसल मन की अनूगूंज होते हैं । उसे जो सुन सकता है, वही उनकी रचना कर सकता है ।
श्री विद्याभूषण मिश्र के गीतों में निःसृत भावधारा में युग के साथ प्रवाहमान रहने की ललक है। आत्मपरक आत्मकथ्य में वे स्वयं एक जगह कहते हैं - ‘युगीन पीड़ा तत्व ने मेरे गीतकार को कुछ ऐसी गीतों की सर्जना हेतु उत्प्रेरित किया, जो स्वतंत्रता के बाद जनतंत्रीय भ्रष्ट राजनीति के कारण नैतिक मूल्य ह्रास्योमुख होते गये। सदाचार पर भ्रष्टाचार का आधिपत्य हो चला। चाटुकारिता, मुखौटेबाजी, अर्थ पैशाचिकता, विश्वासघात के विषैले कुप्रभाव आज दु्रतगतिसे पसर रहे हैं इसे मिश्र जी ने अपने जीवन में भोगा है, और जो भोगा है उसे ‘मन का वृन्दावन जलता है’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । इस गीत संग्रह में टूटते नैतिक मूल्यों के प्रति गीतकार का मन बिलख उठा है। श्री मिश्र जी के इस संग्रह के संबंध में सुप्रसिद्ध गीतकार श्री राम अधीर जी ने लिखा है - श्री विद्याभूषण मिश्र के गीतकार की संवेदनायें - वेदनायें, सुख-दुख और अनुभूतियाॅं वेगमयी है और ये सब उनके गीतकार को ऊर्जा और उष्मा देती है । निम्न पंक्तियाॅं दृष्टव्य हैं -
गूंगे चैराहे बिखरा है भ्रमजाल
निर्णय का झुका-झुका लगता है भाल
पैशाचिक शंकायें, केपित विश्वास
धुंधले व्यवहार, सृजन की जगह विनाश ।
मुकीम भारती जी के गीत आत्मकेन्द्रित होते हुये भी उनका मूल स्वर सार्वजनीन रहा। वे सदा ही आम आदमी के दर्द से जुड़े रहे । गीतकार की आत्मा का कारूणिक चरित्र, गीतों में प्रतिबिम्बित होता हुआ एक आम आदमी की पीड़ा का ही प्रतिनिधित्व करता है।
आज भी अधिकतर लोग मुकीम जी के गीतों की तुलना नीरज के गीतों से करते हैं ।
गीतकार द्वारा स्वयं अपने भोगे हुये यथार्थ की सहजतम अभिव्यक्ति ही मुकीम जी के गीतों में सर्वत्र देखने को मिलती है -
भूख ने ऐसा छेड़ा राग
पेट के भीतर धधके आग
आज तो आंसू पी लेगें
कसमें खाकर जी लेगें
राम जाने क्या होगा कल
मुकीम जी का जीवन अत्यंत कष्टों से भरा था । अनेक कष्टों, आर्थिक अभावों में जीते हुये हर अनुभव को पंक्तियों में ढाल देना मानो सामान्य सी बात हो -
छत है न दरो दीवार, बस रात है - बारिश है
हम फर्श पर बैठे है, खुद अपना बदन ओढ़े
छत्तीसगढ़ के नई पीढ़ी के गीतकार चितरंजन रावल जी जैसे माटीपुत्र के आत्मपरक गीत हृदय को विभोर कर देती हैं -
रावल जी ने अपने जीवन के चालीस वर्षो में जो कुछ भोगा, देखा, सुना उसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के काव्य सुमनों में गूंथने का प्रयास किया है । रावल जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी विचारधारा की प्रतिबद्धता के पूरी ईमानदारी के साथ जैसा देखा, सुना, समझा उसे बिना लाग-लपेट के काव्य रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
पत्नी को प्रेरणा स्त्रोत मानकर रावल जी ने अपनी लेखनी उन्हें समर्पित करते हुये अपना प्रथम गीत संग्रह ‘कुचला हुआ सूरज’ लिखा। पत्नी को प्रेरणा दीप माना व कहा कि ‘प्रकाश की तरह मुझे निरन्तर अंधेरे में मार्ग दिखाती रही तथा साहित्य के क्षेत्र में प्रोत्साहित करती रही।’
पत्नी की प्रेरणा ने ही रावल जी के अंदर सतत् जीवंतता बनाये रखी । अपनी सह धर्मिणी जीवन संगिनी के लिये अपने भावों को, यादों को निम्न शब्दों के माध्यम से रावल जी ने अभिव्यक्त किया है -
बीते हुये दिन अमर हो गये
अब जेठ की दोपहर हो गये
सफर बीच जाने कहां खो गये
अब हमसफर हम कहां रह गये ।
पत्नी के न रहने पर जिन्दगी की वास्तविकता का, जीवन की क्षणभंगुरता का तथा हर पल मौत का साथ के एहसास की अभिव्यक्ति उन्होंने इस तरह से किया -
क्या पता ? जिन्दगी की प्यास लिये
जिन्दगी की शाम आ जाये
या प्यास के गांव में ही, जिन्दगी ठहर जाये
रिश्तों की वास्तविकता, उसके गहरेपन को समझने की मानसिकता जिस किसी में होती है वह उसमें इस कदर रमा रहता है कि जब ठोकर मिलती है तो मन से आह निकलता है -मेरे अपने ही हाथों ने
मेरी पीठ पर छुरा घोंप दिया
सपने थे प्यारे टूट गये सारे
जीते हैं अब तक, हम आह के सहारे
अंत में श्री चितरंजन रावल जी ने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व को निखारने का सारा श्रेय अपनी पत्नी गीता को देते हुये कहा कि उसने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया उसी के फलस्वरूप मैं साहित्य सृजन कर सका । पत्नी के निस्छल स्नेह की छाया में रावल जी का काव्य सृजन होता रहा, पत्नी उन्हें उनकी कविताओं के स्तर के संबंध में हमेशा आगाह करती रही-
एक तिलस्मी उपन्यास यह
इसके अद्भुत परिच्छेद हैं
एक समस्या सुलझाओ तो
आगे अनगिनत अनुच्छेद हैं ।
गीतकार त्रिभुवन पाण्डेय जी उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से जीवन की आत्मपरकता को अभिव्यक्त करते हैं। प्रत्यक्ष जीवन के अनुभव जन्य यथार्थ की अभिव्यक्ति के बिना गीतकार के गीत प्रमाणित एवं प्रभावी नहीं बन पाते । पाण्डेय जी ने अपने जीवन की कठिनाईयों को सहते हुये मानवीय संवेदना को जीवन का कोष माना, परन्तु जब संवेदनाहीन जगत का सामना करना पड़ा तो कवि मन से ये उद्गार फूट पड़े -
जो जुटाया था बहुत कठिनाईयों से उम्र भर
कोष में संवेदना का वही कौस्तुभ फिर नहीं है ।
जीवन जीने के लिये किसी का साथ चाहे वह हमसफर हो या हमसफर सा कोई मित्र, अत्यंत आवश्यक है । बिना साथ के सफर अत्यंत नीरस .व कष्टप्रद हो जाता है -
जब तक तुम हो तब तक मेरा भी अस्तित्व रहेगा
संरक्षित तब तक शब्दों का यह व्यक्तित्व रहेगा
किसी के किसी आत्मीय जन के न रहने पर मन टूट सा जाता है। अकेलापन महसूस करने लगता है और इस अकेलेपन में -
चारो ओर की रंगत भी फीकी लगने लगती है -
चारों ओर लगा है फिर से रंगों का मेला
किन्तु एक पौधा जाने क्यों, दिखता बहुत अकेला
गीतकार का कवि मन बार-बार ऐसे स्थान की तलाश करता है जहाॅं वह शांति से कुछ देर बैठ सके और ऐसा साथ हो जिसे वह अपने मन की सुना सके जो उसकी सुन उसे परेशानियों से मुक्त कर मार्गदर्शन दे सके -
बैठे जहां कुछ देर बिता लें, ऐसा छांव नहीं
तट तक जो पहुंचा दे मन को, ऐसी नाव नहीं
जीवन के उतार-चढ़ाव को, उम्र के साथ मानसिक बदलाव को गीतकार की अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार मिली है -
शांत नदी थी - कहीं नहीं थी लहरों में हलचल
भीतर आंधी बैठ बुन रही, जीवन का हरपल
कभी-कभी लगता है कि यह संसार, मानव व सृष्टिकर्ता सब मानो जादुई चीजें हो, जिसे गीतकार विभिन्न माध्यम से बूझना चाहकर भी नहीं बूझ पाते -
मैं स्वयं तस्वीर सा, दीवार का हिस्सा
जो तिलस्मों से घिरा, अनबूझ वह किस्सा
गीतकार सामान्य जन के बहुत करीब है । वह उनके अनुरूप ही स्वयं को ढालना चाहता है । इसे गीतकार ने अपनी मंजिल बना लिया है तथा वहाॅं तक पहुंचकर उनके कष्टों को हरना चाहता है -
मंजिल बहुत दूर है मेरी, सागर तक जाना
प्यासे है लोग, वहां तक लहरें पहुंचाना
भोगे हुये यथार्थ की अनुभूतियां को साकार करने हेतु उनके मुखरित गीत इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की गोद की साहित्यिक बगिया में खूबसूरत-खुश्बूदार गुलाब हैं, जिनकी ओर हर व्यक्ति की निगाह पड़ती है और देखते ही वह गर्व से मुस्कुरा देता है ।
निष्कर्ष रूप में, आत्मपरक गीतकाव्य में - गीतकार अपने को जिस प्रकार पृष्ठभूमि में रखकर गीतों की रचना करता है, वह रचना भी होता है और रचनाकार थी । व्यक्तित्व के उस दूसरे रूप की सुरक्षा करना वास्तविक गीतकला है । नैतिक आग्रह और सामाजिक बन्धनों के कारण गीतकार के जीवन की घटनायें छनकर आती है ।
जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल वाष्प बनकर शून्य में रहता है और अवसर पाकर घनीभूत होकर पावस में बरस जाता है, उसी प्रकार अचेतन में पड़ी भावनायें भावावेश की अवस्था में गीत बनकर फूटती है । तीव्र रूप होने के बाद कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। चित्रों द्वारा जो भाव प्रकट होते हैं, वे वैयक्तिक भावनाओं से ही उद्भासित रहते हैं । इन चित्रों में अभिव्यक्ति के विविध रूप होते हैं, जिनकी सफलता का आधार यह है कि वे गीतकार के वैयक्तिक-जीवन से कितने-सम्बद्ध हैं ।
आत्मपरकता का आशय यह नहीं कि पाठक या श्रोता उनसे अपनापन नहीं जोड़ पाता । यहां यह स्मरणीय है कि भावनाओं के तीव्र प्रवाह में वैयक्तिक विक्षुब्ध होकर रागात्मकता के साथ साधारणीकृत हो जाती है। गीतकार की प्रतिभा वैयक्तिक जीवन की घटना को निर्वेयक्तिक स्थान दे देता है । व्यक्तिगत् भाव सामान्य सत्य के रूप में परिणत हो जाते हैं।
आत्मपरक गीतकाव्य में गीतकार की वैयक्तिक अनुभूति, उसकी अन्तर्वासना स्पष्टतः झलकती हैं। ये अनुभूतियां ही गीतकाव्य का उपजीव्य हैं ।
संदर्भ-ग्रंथः-
1 नये पुराने (गीत अंक-3) सितम्बर - 1998, पृष्ठ-181
2 हिन्दी साहित्य का इतिहास - डाॅ. नगेन्द्र, पृष्ठ- 622
3 मधु कलश - हरिवंशराय बच्चन ।
4 मधु कलश - हरिवंश राय बच्चन
5 एकान्त संगीत - हरिवंश राय बच्चन
6 पलाशवन - नरेन्द्र शर्मा
7 नये पुराने गीत अंक- 3 संपादक - दिनेश सिंह - सितम्बर 1998, पृष्ठ- 181
8 युगीन संदर्भ - महादेवी वर्मा ।
9 संकल्प रथ - मार्च 2001 - श्रीराम अधीर, पृष्ठ-6ए28
10 प्रत्यय - परमार स्मृति, अप्रैल-मई 2003, पृष्ठ-6ए 10
11 सब कुछ निस्पंद है - नारायण लाल परमार, पृष्ठ-88
12 श्री हरि ठाकुर का काव्य व्यक्तित्व - विश्वेन्द्र ठाकुर, पृष्ठ-7ए 9
13 नवभारत (समाचार) 14-12-97, शीर्षक - एक सार्थक गीत कृति ।
14 मन का वृन्दावन जलता है - विद्याभूषण मिश्र
15 पत्थर और कांचघर - मुकीम भारती ।
16 कुचला हुआ सूरज - चितरंजन रावल (आत्मकथ्थ्य - आमुख में प्रकाशित)
17 (मैंने सुना) सूनो सूत्रधार - त्रिभुवन पाण्डेय
Received on 02.03.2016 Modified on 08.04.2016
Accepted on 15.06.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(2): April - June, 2016; Page 48-55